Kedarkanta trek reviews 2012-Ashwini kumar

Kedarkanta Trek Review By Ashwini Kumar
(Kedarkanta trek  – April 2012 Batch)
 

 

यात्रावृतांत (travelogue) – केदारकंठ ट्रेक

 

Indiahikes के तत्वावधान में आयोजित केदारकंठ ट्रेक एक सुखद अनुभव रहा. दरअसल, इस ट्रेक के अनुपम सौंदर्य को देखना, निहारना, उससे वशीभूत होना बहुत आसान है, इस प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन करना कहीं ज़्यादा मुश्किल है. फिर भी मैं अपने अनुभवों को सुधी पाठकों के साथ बांटने की कोशिश करूँगा. इसे पढ़कर एहसास होगा कि ये ट्रेक क्यों करना चाहिए.

 

1. इस ट्रेक की शुरुआत देहरादून से सांकरी की यात्रा से होती है. इस दौरान पहाड़ी रास्तों से गुजरते हुए गढ़वाल के छोटे-बड़े कस्बों की ज़िन्दगी की एक झलक मिलती है. यमुना और टोंस नदियों के स्वच्छ, शफ्फाफ़ पानी को देखकर यकीन होता है कि हमारे शहरी समाज ने इन नदियों के अस्तित्व को ही ख़तरे में डाल दिया है. विश्वास नहीं होता कि यही यमुना कुछ सौ किलोमीटर की दूरी तय कर जब दिल्ली पहुँचती है तो लोग इसके पानी के स्पर्श से भी कतराते हैं. पूरे दिन का सफ़र ख़त्म होते होते सभी ट्रेक-साथी सांकरी पहुंचे तो वहां हमारे ट्रेक पर्यवेक्षक ब्रम्हा ने हमें ट्रेक के नियमों से अवगत कराया. हिमालय की नाज़ुक पारिस्थितिक व्यवस्था के मद्देनज़र हमें ट्रेक के दौरान क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए इसका बोध कराया. सांकरी में गढ़वाल मंडल विकास निगम के विश्राम गृह की भौगोलिक स्थिति बहुत सुन्दर है. सामने पहाड़ों का ख़ूबसूरत मंज़र और छोटे से गाँव का जन-जीवन दोनों साफ़ नज़र आता है. एक ऐसा गाँव जहाँ आप मशीनी आवाज़ से दूर होते चले जाते हैं.

 

2. ट्रेक के पहले दिन हमने सांकरी से जुड़ा-का-तालाब तक की दूरी तय की. सफ़र बहुत मनोरम था, पेड़ों के बीच से गुज़रते हुए और झरनों के पानी से गले तर करते हुए हमने क़रीब ४ किलोमीटर की दूरी तय की. बीच सफ़र में हमारे एक साथी, गणेश, को मांस-पेशियों में खिंचाव और दर्द का आभास हुआ. ब्रम्हा के उपचार और मदद से गणेश ने बाक़ी का सफ़र पूरा किया. जुड़ा-का-तालाब में तम्बुओं में हम सबने रात गुज़री. ये भी एक अच्छा अनुभव रहा. अगले दिन जुड़ा-का-तालाब से केदारकंठ बेस कैंप तक की दूरी तय की. पड़ाव नियत स्थान से पहले ही लगाना पड़ा क्योंकि इसके आगे बर्फ़ ज़्यादा थी. जगह बहुत ख़ूबसूरत थी. दोपहर में बादलों ने थोड़े देर तक हमें घेरे रखा और बहुत थोड़े देर के लिए बूंदा-बांदी भी हुई. साहिर लुधियानवी की ये पंक्तियाँ बरबस याद आ गईं – ‘दूर वादी में दूधिया बादल, झुक के परबत को प्यार करते हैं’ . इस बर्फ़ पर फ़िसलने का राजमोहन जी का निमंत्रण बहुत ट्रेक-साथियों ने स्वीकार किया. मेरे तम्बू के साथी हिमांशु फिसल कर बहुत उत्साहित दिख रहे थे. सुबह पौ फटने से पहले हमें नींद से जगाया गया. आँख मलते – मलते जब लोगों ने बाहर आसमान की तरफ़ नज़र किया तो बेशुमार तारों के क़ाफ़िले ने लोगों को पूरी तरह जगा दिया. सुबह सूरज की किरणों ने हजारों सितारों को हमसे छीन लिया , साथ ही हमारे सबसे महत्वपूर्ण दिन की शुरुआत भी हो गई. हम केदारकंठ के शिखर की ओर बढ़ चले. अक्सर चढ़ाई मुश्किल लगी, लेकिन ब्रम्हा और राजमोहन की जोड़ी ने हमें सँभाल लिया. कुछ घंटों में हम शिखर पर थे. कुछ तेज़-कुछ सुस्त क़दम हम सब शिखर पहुँच गए और चारों तरफ़ खड़े हिमालय को स्तब्ध भाव से देखते रहे. कल्याण सबसे आगे था. मैं सबसे आखिर में. सबके चेहरे पर ख़ुशी तारी थी. वो स्वर्ग-रोहिणी, वो बन्दर-की-पूंछ . इन सब शिखरों से हमारा तार्रुफ़ कराया इस ट्रेक ने. शिखर से नीचे उतरना भी खूब मज़ेदार रहा. तीन बार हमें काफ़ी ऊंचाई से फिसलने का मौका मिला. उस शाम हम सब summit के नशे में चूर जब अपने अगले पड़ाव हरगांव पहुंचे तो वहाँ के खूबसूरत मंज़र ने सारी थकान भुला दी. आखिरी दिन हम हरगांव से सांकरी चिनार के पेड़ों के बीच से गुज़रते हुए पहुंचे. पूरा रास्ता हरियाली से भरा था . परिंदों की आवाजें दिल को लुभा रही थी. कठफोड़वा (woodpecker)  दिखाई दिया और अरविन्द, अनूप, कल्याण  के कैमरे सक्रिय हो गए . तभी पवन ने नीली नीली दो परिंदों को देखा और कैमरे उनको क़ैद करने की होड़ में लग गए. बीच में सुर्ख़ लाल फूलों वाले पेड़ ने हमारा ध्यान आकर्षित किया. आनंददायक था पूरा सफ़र. शाम सांकरी में एक जश्न हुआ देशी मदिरा के साथ . चार दिन कैसे गुज़र गए किसी को कुछ पता नहीं चला. अगले दिन सुबह सांकरी से देहरादून वापस लौटते हुए लोगों के चेहरे पर संतुष्टी, थकन, उल्लास, उत्साह सब का मिश्रण देखा जा सकता था.

 

3. प्रकृति के अलावा लोगों ने भी ट्रेक को स्मरणीय बनाने में योगदान किया. पंकज और प्रशांत का हास्य रस , हिमांशु का मधुशाला काव्य पाठ और अनूठा हास, अर्नव की खुशमिजाज़ी, ब्रम्हा के सुरों से सजी शाम, जसप्रीत की जिंदादिली इन सब ने मिलकर ट्रेक को कामयाब बनाया. मेरे तम्बू के साथी हिमांशु और अर्नव के खर्राटों का बदला मैंने सांकरी पहुँच कर लिया. स्थानीय राजमोहन, गज्जी, संजय, और तिरपन ने अच्छा काम किया. सांकरी के बच्चों ने आखिरी दिन हमें घेर लिया, चॉकलेट के एवज में उनकी बेसाख्ता हँसी अच्छी लगी.

 

4. पूरे ट्रेक का आयोजन indiahikes की टीम ने बखूबी किया. ट्रेक की एक विशेषता ये थी कि इसने लोगों को जोड़ने का काम किया. विभिन्न प्रान्तों से आए लोगों की अपनी अपनी खूबियाँ थी. ट्रेक के दौरान मुसीबत में लोगों का एक दुसरे के काम आना, ये मेरे विचार में इस ट्रेक का हासिल था. गुलज़ार की ये पंक्तियाँ ‘वक़्त पे काम आए हैं अक्सर जो मेरे, अजनबी थे वो मेरे हमदम नहीं थे’ सही साबित हुई. इंसानी जज्बों को बढ़ाने का काम किया इस ट्रेक ने. अगर कोई मुझसे पूछे कि ये ट्रेक क्यों करना चाहिए तो उसका एकमात्र कारण इसमें लोगों को बेहतर बनाने की क्षमता है .

 

 

Sandhya UC

Sandhya UC

Sandhya is a founding partner at Indiahikes. Over the past ten years, she has explored and put on the map few of the greatest Himalayan treks in India, including Kashmir Great Lakes and Kedarkantha. She is a TedX Speaker and has been awarded the Women of Worth Award by Outlook Business in 2017. She believes in sustainable living just as she believes in sustainable trekking. Read a feature on Sandhya in Outlook Business Read Sandhya's other articles Read Sandhya's TedX Talk, How I Climbed The Mountain Of Entrepreneurship

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